Tuesday, 3 December 2019

"गुनाहों का देवता"


परिचय: 
"गुनाहों का देवता" को निस्संदेह हिंदी के 10 सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में से एक माना जा सकता है|  "गुनाहों का देवता" का प्रथम संस्करण 1959  में छपा था और तब से लेकर अब तक 100 से अधिक संस्करण छप चुके हैं जो इसकी लोकप्रियता की अपने आप में एक मिसाल है| यह सही मायने में एक कालजयी रचना है|

लेखक के बारे में:
२५ दिसम्बर १९२६ को जन्मे धर्मवीर भारती आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रमुख लेखक, कवि, नाटककार और सामाजिक विचारक थे। वे एक समय की प्रख्यात साप्ताहिक पत्रिका धर्मयुग के प्रधान संपादक भी थे।

उनका उपन्यास गुनाहों का देवता सदाबहार रचना मानी जाती है. सूरज का सातवाँ घोड़ा को कहानी कहने का अनुपम प्रयोग माना जाता है, जिस श्याम बेनेगल ने इसी नाम की फिल्म बनायी. अंधा युग उनका प्रसिद्ध नाटक है।  
उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं: साँस की कलम से, मेरी वाणी गैरिक वसना, कनुप्रिया, सात गीत-वर्ष, ठंडा-लोहा, सपना अभी भी, सूरज का सातवाँ घोड़ा, बंद गली का आख़िरी मकान, पश्यन्ति, कहानी अनकही, शब्दिता, अँधा-युग, मानव-मूल्य और साहित्य और गुनाहों का देवता| डॉ धर्मवीर भारती को 1972 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया |
४ सितम्बर, १९७७ को मुंबई में उनका देहावसान हो गया|  

सरलीकृत सारांश:
एक भावुक, आदर्शवादी और महत्वाकांक्षी युवा की प्रेम में उत्थान और पतन की कहानी|

सारांश:
यह कहानी है एक भावुक, आदर्शवादी और महत्वाकांक्षी युवा "चंदर" की जो जीवन में महान सफलता हासिल करना चाहता है| वह अपने परिवारवालों से आगे पढ़ाई करने, लड़-झगढ़ कर इलाहाबाद आ गया है जहां वह अपने प्रोफेसर के मार्गदर्शन में पीएचडी कर रहा है. प्रोफेसर एक बेटी है "सुधा". चंदर और सुधा के बीच एक गहरा रिश्ता है जो धीरे-धीरे स्वाभाविक रूप से बना है और जिसे प्यार की सीमित परिभाषाओं में बांधना असंभव है|
चंदर की यह धारणा है कि उसे किसी के साथ अंत-रंग संबंधों से दूर रहना चाहिए क्योंकि वह आंतरिक-स्व को नष्ट कर देता है.कहानी प्रगति में, सुधा की विवाह का अवसर आ जाता है जब चंदर को एक हद तक ये एहसास हो जाता है की बिना सुधा के वो क्या है|  मगर अपनी महानता की चाहत, आदर्शवाद, मध्यमवर्ग के तत्कालीन सामाजिक वर्जनाओ के पीछे वह त्याग और बलिदान का रास्ता चुनता है| चंदर सोचता है कि सुधा के लिए अब विवाह ही उसके लिए उचित है|और अंततः सुधा के मर्ज़ी के खिलाफ उसकी शादी हो जाती है| घटनाक्रम के साथ चंदर में बहुत विरोधाभासी विचार अंकुरित हो जाते है और चंदर सोचता है कि वह उससे बात कर रही है, केवल इसलिए कि वह शादीशुदा है और एक प्रेमी की जरूरत है. चंदर की सोच में आमूल परिवर्तन हो जाता है और वह उसकी अनदेखी शुरू होता है| चंदर की नज़रअंदाज़ से आहत सुधा बहुत बीमार हो जाती है और अंततः मर जाती है|
चंदर मानता है कि नारी के साथ सम्बन्ध में यही सबसे अच्छा तरीका है कि  उसे वह एक मूर्ति की तरह व्यवहार करे और स्पर्श न करे| लेकिन वह बार-बार गलत साबित हो जाता है| हालांकि वह सोचता है कि वह देवता है जो किसी के साथ अंतरंग संबंधों में लिप्त नहीं है परन्तु अंत में वह खुद को अकेला खड़ा पाता है|
यह एक बहुत मजबूत बहस का विषय है लेकिन जिस तरह से लेखक ने इस निभाया है वह अतुलनीय है|
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सामाजिक / ऐतिहासिक प्रसंग:
"गुनाहों का देवता" मूलतः मध्य-वर्ग के अंतर्विरोध, विरोधाभासी परिस्थियों में बीच जन्मी एक कहानी है| लेखक कथानक कि शुरुवात करते है इलाहाबाद के विषमताओ और विविधताओं से परिचय से साथ मानो आगे आने वाले अंतर्विरोधों का एक हल्का संकेत देना चाहते हों| लेखक ने कई समाजिक मूल्यों और वर्जनो को भी छुवा है जैसे प्रेम-विवाह, अंतरजातीय विवाह, जाती-व्यवस्था, नारी शिक्षा, बाल-विवाह इत्यादि| प्रेम के विविध रूपों और अभिव्यक्तियों को कथानक का मुख्य बिंदु बनाया गया है|       

लेखन शैली:
"गुनाहों का देवता" की भाषा-शैली सरल, वर्णनात्मक और कथा-प्रवाह बहुत मजबूत है| भावनाओं के अभिव्यक्ति के लिए उपयुक्त शेरों-शायरिओं भी प्रयुक्त किये गए है|     



पात्र-परिचय:
इस उपन्यास में लेखक ने प्रत्येक चरित्र को एक सरल पर मजबूत पहचान दी है|  इस उपन्यास के मुख्य पात्र है- आदर्शवादी चंदर,कल्पनामयी सुधा, व्यावहारिक, यथार्थ और संयत बिनती, आधनुकितावादी पम्मी|  सभी के लिए प्रेम के मायने अलग-अलग हैं| एक के लिए वह बलिदान और महानता है, अन्य के लिए कर्तव्य और समर्पण,
एक के लिए व्यावहारिकता और आपसी-सम्मान, एक के लिए स्वतंत्रता और आकर्षण|      
अन्य महत्वपूर्ण पात्र है - प्रेम में निराश बर्टी, शायर परन्तु यथार्थवादी गेसू, विरोधाभासी डॉ. शुक्ला, रूढ़िवादी बुआ जी,
व्यावहारिक और राजनीतिक कैलाश|

विवरण:
किसी भी कथानक की प्रभावशीलता, पात्रों का ताना-बाना,कथा-प्रवाह का Setting (स्थान, काल और परिस्थितियां) से सीधा सम्बन्ध होता है| अगर सही संतुलन ना हो तो प्रभाव नकारात्मक भी हो सकता है| इनका पात्रों के विचार, भाषा, मान्यताओं पर सीधा असर होता है| हर लेखक अपने कथानक की शुरुवात अलग करता है| कोई किसी अपने पात्र के परिचय के साथ, कुछ कथानक के अंतर्द्वंद और plot के साथ और कुछ उस दुनिया के परिचय के साथ जिसमे उनके पात्रों को जीना है| कथानक की पृष्ठभूमि भी अपने आप में एक पात्र हो सकता है|
"गुनाहों का देवता" का प्रारंभ होता है कथानक की पृष्ठभूमि इलाहाबाद के परिचय से| लेखक के अनुसार इलाहाबाद एक विषमताओ और विविधताओ का शहर है जहाँ एक तरफ चौड़ी सड़कें है तो कही तंग गलियाँ, एक तरफ महानगरों जैसी सिविल लाइंस तो कहीं दलदली मुहल्ले| इतने विविध रंग मानो इस शहर का नगर-देवता स्वर्ग से निर्वासित कोई मनमौजी और रोमांटिक कलाकार है  |
चंदर अपने परिवारवालों से लड़कर आगे पड़ाई करने इलाहाबाद आ गया था और तब से डॉ. शुक्ला जो उसके Senior  शिक्षक थे, ने ही उसकी समय-समय पर सहायता की है और एक पिता-तुल्य प्यार दिया है| डॉ. शुक्ला के अपनेपन के कारण यह कभी पता ही नहीं चल पाया और चंदर उनके घर का एक हिस्सा बन गया था|
सुधा जो पहले गाँव में अपनी बुआ जी के साथ रहती थी, वर्षो पहले 7 वीं पास करके वापस अपने पापा के पास आ गयी थी, बचपन की जिद्दिपना, महाराजिन और माली से छोटी-छोटी बातों पर लड़ाई, पापा का गुस्सा और फिर अनबोला 2 साल तक चलते रहे| अक्सर चंदर ने पिता और बेटी में समझौता करवाया| धीरे-धीरे "घर-भर से अल्हड़ पुरवाई और विद्रोही झोंके की तरह तोड़-फोड़ मचाती रहने वाली सुधा, चंदर की आँख के इशारे पर सुबह ही नसीम की तरह शांत हो जाती थी| कब और क्यों उसने चंदर के इशारों का यह मौन अनुशासन स्वीकार कर लिया था, यह उस खुद नहीं मालूम था, और यह सभी कुछ इतने स्वाभाविक ढंग से, अपने-आप होता गया की दोनों में से कोई भी इस प्रकिया से वाक़िफ़ नहीं था, कोई भी जागरूक न था, दोनों का एक-दूसरे के प्रति अधिकार और आकर्षण इतना स्वाभाविक था जैसे शरद की पवित्रता या सुबह की रोशनी"                        

चंदर, डॉ. शुक्ला का एक निबंध टाइप करवाने के सिलसिले में एंग्लो इंडियन लड़की पम्मी के घर जाता है| वहां कुछ छोटी-मोटी ग़लतफ़हमियों की वजह से हलकी-फुलकी झड़प हो जाती है पम्मी के भाई बर्टी से जो थोड़ा मानसिक रूप से अस्व्थ्य है| फिर पम्मी से मिलता है और थोड़ी देर में वह ग़लतफ़हमियाँ दूर हो जाती है| बातचीत के दौरान पम्मी कहती है कि उसे विवाह से नफरत है और  चंदर जो अविवाहित है, से दोस्ती निभ जाएगी| चंदर उसको अच्छा लगता है  और उसे अपना दोस्त मान लेती है| किताबों से उसे नफरत थी क्योंकि "एक कहानी लिखने के लिए कितनी कहानियों की ट्रैजेडी बर्दाश्त करनी होती है"|    

सुधा कि सबसे घनिष्ठ मित्र थी "गेसू"| गेसू शायर होते हुए भी यथार्थवादी थी और सुधा शायर न होते हुए भी कल्पना-लोक की थी| सुधा अपने व्यवहार और गठन में खुद ही एक शायरी बन गयी थी| वे दोनों दुनिया भर की बातें करते, एक-दुसरे के सपने बांटते| बाकी सहेलियाँ उन्हें "चंदा-सूरज की जोड़ी" कहते| ब्याह की बात पर सुधा कहती कि कितना अच्छा हो अगर उन्हें शादी-ब्याह के झंझट में ना फसना  पड़े और इसी तरह हसते-बोलते, पढते-लिखते, बादलों से प्यार करते हुए कटते जाएँ| गेसू अपनी शायरी से जिंदगी की कई भावनाएं व्यक्त करती है|      
   
सुधा के पिता, डॉ. शुक्ला अंतर्विरोधों के व्यक्ति थे| पार्टियों में गैर-धर्मियों से साथ खाना खाने में उन्हें कोई ऐतराज़ नहीं था परन्तु कच्चा खाना वे चौके में आसन पर बैठकर, रेशमी धोती पहनकर खाते थे| पूजा-पथ, खान-पान, जात-पांत के पक्के हामी थे, लेकिन व्यक्तिगत जीवन में कभी यह नहीं जाना की उनका कौन सा शिष्य ब्राह्मण है या कोई और| जाती-व्यवस्था, अंतर्जातीय-विवाह और प्रेम-विवाह के मामले में उनके विचार अभी संकीर्ण है|  

एक दिन पम्मी चंदर को मिलने डॉ. शुक्ला के घर पहुंची और वहां चंदर तो नहीं मिला परन्तु सुधा से मुलाकात हो गयी| सुधा उसे बताती है कि चंदर उसकी कितनी तारीफ करता है| पम्मी, सुधा से चंदर की पसंद-नापसंद के बारे में पूछती है |बातों-बातों में पम्मी कहती है कि| पम्मी की कई बातों से सुधा थोड़ी आश्चर्चाकित होती है|उसकी आजद्ख्याली, सरलता और बेतकल्लुफी उसे अच्छी लगी| चंदर के बारे में पम्मी के विचार सुनकर उसे चंदर पर गर्व होता है और उसके लिए इज्जत और बढ जाती है|

और एक दिन बुआ जी आ गयी बिनती को लेकर जिसकी शादी की  तैयारियां हो रही थी|  बुआ जी बिनती को अपशगुनी मानती थी क्योकि इसके जन्म के तुरंत बाद उसके पिता की मृत्यु हो गयी थी| बुआ जी बिनती से कभी सीधे मुहं बात नहीं करती थी और हमेशा कुछ ना कुछ ताने देती रहती थी और कोसते रहती थीं| बुआ जी दुनिया भर के लिए स्नेहमयी थी सिर्फ बिनती को छोड़कर|  बिनती ग्रामीण माहौल में पली-बड़ी एक सरल और व्यावहारिक लड़की है मगर वह  बुआ जी के तानो से दुखी रहती थी|

परतु अचानक बुआ जी ने सुधा के विवाह के बात झेड़ दी और डॉ. शुक्ला को भी ये उचित लगा क्योकि सुधा बी.ए. फाइनल में थी और उनके हिसाब से उतनी शिक्षा काफी थी अन्यथा उचित लड़का मिलाना मुश्किल हो जाता|    
सुधा के विवाह के बात-चित से ना जाने अन्दर क्या टूट गया था|एक असहनीय दर्द जो उसकी नस-नस को तोड़ गया था| चंदर की निगाहों में एक अजब सा पथराया सूनापन, एक जाने किस दर्द की अमंगल छाया, एक जाने किस पीड़ा की मूक आवाज, एक जाने कैसी पिघलती हुई-सी उदासी और वह भी गहरी, जाने कितनी गहरी..छा गयी थी|
सुधा के लिए चंदर का यह रूप परिचित था और इस रूप को देखकर वो डरकर कांप उठी|

चंदर पम्मी के साथ सिनेमा देखने जाता है| पम्मी अपने बात-चित के दौरान चंदर के चरित्र के बहुत तारीफ करती है| "तुम बड़े पवित्र लगे| तुमने आते ही प्रणय याचना नहीं की| तुम्हारी आँखों में भूख नहीं थी| हमदर्दी थी, स्नेह था, कोमलता थी, निश्छलता थी|तुम मुझे काफी अच्छे लगे| तुमने मुझे अपनी पवित्रता देकर जिला दिया...|
चंदर को अपनी "पवित्रता" पर अजब सा गौरव अनुभव हुआ| बात-चित के दौरान पम्मी कहती है कि  "में तो प्रेम में भी प्रेम-विवाह के पक्ष में नहीं हु और प्रेम में वासना का विरोध करती हूँ|"
       
उस रात चंदर को ठीक से नींद नहीं आई और बुरे-बुरे ख्याल आते रहे|अगले दिन सुधा से मिलने पर चंदर उससे कहता है कि "तुम मेरी जिंदगी में विश्वास कि चट्टान हो|इस विश्वास के बल पर हर लहरों से उबर सकता हूँ परन्तु यदि यह हिला तो अँधेरी गहराइयों में डूब जाऊँगा|"

बिनती, सुधा के होने वाले पति की तस्वीर चंदर को दिखाती है| चंदर की आँखों में आँसू देखकर बिनती को अच्छा नहीं लगता और उससे कहती है कि आपके आँखों में आँसू अच्छे नहीं लगते| जितनी पवित्रता और ऊंचाई से आपने सुधा के साथ निभाया है , यह तो शायद देवता भी नहीं कर पाते और दीदी ने जो आपको निश्छल प्यार दिया है उसको पाकर तो आदमी स्वर्ग से भी ऊँचा उठ जाता है, फौलाद से भी ताक़तवर हो जाता है| चंदर बिनती से फोटो ले लेता है ताकि सुधा को दिखा सके|   
सुधा को फोटो दिखने के बाद बड़े प्यार से उससे कहता है कि वह इससे शादी कर ले| सुधा चोट खाए नागिन कि तरह तड़प उठी| कहती है "हिम्मत थी तो साफ़-साफ़ कहते हमसे| हमें इस तरह से बाँध कर बलिदान चढ़ा रहे हो| सारी दुनिया में तुम्ही एक रह गए थे मुझे फोटो दिखने के लिए|"        
चंदर उस समझाते हुए कहता है कि "मैं तुम्हारे मन को समझता हूँ|तुम्हारे मन ने तुमसे जो नहीं कहा, वह मुझसे कह दिया था- लेकिन सुधा, हम दोनों एक-दूसरे कि जिंदगी में क्या इसीलिए आये थे कि एक-दूसरे को कमजोर बना दे या हम लोगो ने स्वर्ग कि उचाईयों पर साथ बैठकर आत्मा का संगीत सुना सिर्फ इसीलिए की उस अपने ब्याह ही शहनाई में बदल दे?"

"सोने की पहचान आग में होती है, लपटों में अगर उसमे और निखर आये तभी वह सच्चा सोना है| सचमुच में तुम्हारे व्यक्तित्व को बनाया है या तुमने मेरे व्यक्तित्व को बनाया है, यह तो तभी मालूम होगा जबकि हम लोग कठनाइयों से, वेदनाओं से, संघर्षों से खेलें और विजयी हों और तभी मालूम होगा कि सचमुच मैंने तुम्हारे जीवन में प्रकाश और बल दिया था|अगर सदा तुम मेरी बाँहों की सीमा में रहीं और में तुम्हारी पलकों की छाँव में रहा और बहार के संघर्ष से हम लोग डरते रहे तो कायरता है|"
"हमें तो आज खुश होना चाहिए की अब सामने जो रास्ता है उसमे हम लोगो को यह सिद्ध करने का अवसर मिलेगा की सचमुच हम लोगों ने एक-दूसरे को उचाई और पवित्रता दी है|"
"जीवन में अलगाव, दूरी, दुःख और पीड़ा आदमी को महान बना सकती है| भावुकता और सुख हमें ऊँचा नहीं उठाते|"
"में ऊँचा उठू तुम्हारे विश्वास से सहारे,.."
"चाहो तो मेरे जीवन को एक पवित्र साधन बना दो, .."

बिनती ने फोटो उठाकर इशारे से पूछा, "मंजूर?" "हाँ"| "बिनती बजाय खुश होने के चंदर की ओर देखकर सिर झुका लिया.."
         
"घबराओ ना मेरे देवता, तुम्हारी उज्जवल साधना में कालिख नहीं लगाउंगी"  

"सुधी, तुम्हे मेरा ध्यान नहीं है?"
"ओर किसका है चंदर!तुम्हारा ध्यान नहीं होता तो देखती कौन मुझे झुका सकता था"

इन्ही  उलझनों के बीच बेचैन सुधा, चंदर और बिनती को लेकर पम्मी से मिलने जाती है|  सुधा, पम्मी से अग्रेजी कविता सुनाने का आग्रह करती है| पम्मी सुनाने लगती है..
"मैं तुम्हे प्यार नहीं करती हूँ न| मैं तुम्हे प्यार नहीं करती हूँ|
फिर भी में उदास रहती हूँ जब तुम पास नहीं होते हो!
और में उस चमकदार नीले आकाश से भी इर्ष्या करती हूँ जिसके नीचे तुम खड़े होगे औए जिसके सितारे तुम्हें सेख सकते हैं.."   
....
"न मुझे मालूम है की में तुम्हें प्यार नहीं करती हूँ, लेकिन फिर भी, कोई शायद मेरे साफ़ दिल पर विश्वास नहीं करेगा|
और  अक्सर मैंने देखा है, कि लोग मुझे देखकर मुस्कुरा देते है क्योंकि में उधर एकटक देखती हूँ, जिधर से तुम आया करते हो!'

इतने तुफानो और अंतर्द्वंदों से आहत सुधा उस दिन बहुत बीमार हो जाती है और तेज बुखार के प्रभाव में ही वो चंदर पर चिल्ला उठती है..
"तुम, पम्मी, गेसू, पापा, डॉक्टर सब लोग मिलकर मुझे पागल कर दोगे| पापा कहते हैं ब्याह करो, पम्मी कहती है मत करो, गेसू कहती है तुम प्यार करती हो और तुम..तुम कुछ भी नहीं कहते|तुम मुझे इस नरक में बरसों से सुलगते देख रहे हो और बजाय इसके कि तुम कुछ कहो, तुमने मुझे खुद इस भट्टी में धकेल दिया!.."

इधर चंदर सोचता है "जब वह अपने मन को शांत रख सकता है, हँसते-हँसते सब बर्दाश्त कर सकता है तो सुधा क्यों नहीं?क्या उसने यह रास्ता जो विलक्षण है, अपना कर भूल की? क्या सुधा भी एक भावना की बनी एक साधारण सी लड़की है जिसके लिए प्रेम और घृणा का स्तर उतना ही साधारण है| क्या वे दोनों विलक्षण/असाधारण नहीं हैं? क्या सुधा इस "साधना" और "तलवार की धार पर चलने"  के लिए असमर्थ है?    यह तो चंदर की हार थी|   

सुधा चंदर की आत्मा है; इस अब चंदर खूब अच्छी तरह पहचान गया| तो क्या अपनी ही आत्मा को घोंट डालने की हत्या का पाप चंदर के सर पर है?

क्या पुरुष और नारी का सम्बन्ध का एक ही रास्ता है - प्रणय, विवाह और तृप्ति| पवित्रता, त्याग और दुरी क्या संबंधों को, विश्वंशों को जिन्दा नहीं रहने दे सकते? तो फिर सुधा और पम्मी में क्या अंतर है? क्या सुधा के हृदय के इतने समीप रहकर, उसके व्यक्तित्व में घुल-मिलकर और आज इतने अंतर पर डालकर क्या वह पाप कर रहा है?"
बिनती से कहता है, "तुम कहती हो, सुधा को इतने अंतर पर रखा तो में देवता हूँ! सुधा कहती है, मैंने अंतर पर रखा, मैंने पाप किया!"   
इन्ही घटनाक्रमों के बीच सुधा कि शादी हो जाती है|
किसी तरह सुधा इस परिस्तिथि को स्वीकार कर लेती है शादी का दिन भी करीब आ जाता है|

घटनाक्रम में आगे, कुछ बाहरी बातों प्रभाव और कुछ अपने अंतर्द्वंद के चलते चंदर के मन में कई विरोधाभाषी विचार पैदा हो जाते है| उसको लगने लगता है कि ये चारो और का त्याग, साधनं सौन्दर्य सब झूठ है और सुधा भी एक साधारण लड़की है जो क्वारें जीवन में पति और विवाहित जीवन में प्रेमी की भूखी होती है| और धीरे-धीरे वो शैतान से हार रहा था| उसका पवित्रता का गर्व ही उसे नीचे धकेल रहा था| उसको लगाने लगा मनो सुधा के आसूं झूठे थे और घूम-फिर कर उसको विवाह करना ही था| विश्वास और त्याग काहे का?
चंदर  का विश्वास टूट गया था, गर्व घमंड में बदल गया और घमंड नफरत में, और नफरत चूर-चूर कर देने वाली उदासी में|

सुधा डेढ़ महीने बाद जब आयी, चंदर का उससे व्यवहार काफी रुखा था| पर बाद में सुलह हो जाती है और चंदर एक बार फिर वही चंदर बन गया था |  
फिर   कुछ दिनों बाद सुधा अपने पति के साथ वापस चली गयी एक वधस्थल पर जाते हुए बेबस अपराधी की तरह..

सुधा के जाने के साथ ही चंदर का उल्लास और ताकत एक बार फिर खो गया जैसे एक जलागार जिसमें हर चाँद, सूरज, सितारें और बादल की छांह पड़ती है और उनके चले जाने के बाद फिर वह उनका प्रतिबिम्ब धो डालता है| हर घटना एक सपने की तरह गुजर जाते|

चंदर का प्यार और सेक्स के प्रति विचार पूरा बदल जाता है..उसको लगता है, प्यार का मुख्या अंश सेक्स है, बाकी सभी कुछ उसकी तैयारी है, उसके लिए एक समुचित वातावरण और विश्वास का निर्माण करना है..यहाँ तक सुधा के ख़त में सेक्स के प्रति गहरी अरुचि को एक स्वांग मानने लगता है| यहाँ तक उसने सुधा के एक ख़त का जवाब नहीं दिया| और बिनती से भी ठीक से बात करना छोड़ दिया था|
“जब भावना और सौंदर्य के उपासक को बुद्धि और वास्तविकता की ठेस लगती है, तब वह सहसा कटुता और व्यंग्य से उबल उठता है।”

सुधा के लिए अपने भावना के बारे में बिनती से कहता है, "मेरे  मन में एक आदर्शवादी भावुकता थी जो अधकचरे मन की उपज थी, एक एसी भावना थी जिसके औचित्य पर ही मुझे विश्वास नहीं, वह एक सनक थी"|

बिनती विवाह के लिए गाँव चली गयी|

इसी बीच सुधा का ख़त आया, लिखा "चंदर तुमने अच्छा नहीं किया| मेरी आत्मा तुम्हारे लिए बनी थी, उसके रेशे में वे तत्व है जो तुम्हारी ही पूजा के लिए थे| तुमने मुझे दूर फेंक दिया, लेकिन इस दूरी के अँधेरे में भी जन्म-जन्मान्तर तक भटकती हुई ..सिर्फ तुम्ही को ढूंढ़गी, इतना याद रखना और इस बार अगर तुम मिल गए तो जिंदगी की कोई ताकत, कोई आदर्श, कोई सिद्धांत, कोई प्रवंचना मुझे तुमसे अलग नहीं कर सकेगी|लेकिन मालूम नहीं पुनर्जन्म सच है या झूठ! अगर झूठ है तो सोचो चंदर की इस अनादिकाल के प्रवाह में सिर्फ एक बार..सिर्फ एक बार में अपनी आत्मा का सत्य ढूँढ पाया था और अब अनंतकाल के लिए उसे खो दिया|"

इसी बीच पम्मी वापस आयी मसूरी से...चंदर जैसे संगीत की लय में स्वर्गभ्रष्ट देवता की तरह खो गया...|
फिर एक दिन डॉ. शुक्ला गाँव से वापस आ गए, बिनती और बुआ जी साथ थे..बिनती की शादी कई हंगामों के बाद टूट गयी थी|
डॉ. शुक्ला इस अनुभव से काफी आहत हैं और जाति, विवाह आदि व्यवस्थाओं के प्रति विचार बदले हुए है जिस पर चंदर को बहुत आश्चर्य होता है|यहाँ तक वे बिनती के लिए गैर-जातीय लड़के के लिए तैयार हैं| और बिनती के आगे पढ़ाई से भी कोई ऐतराज़ नहीं है|

लगातार अपमानों से जैसे बिनती के स्वाभिमान जो जगा दिया था| बिनती के स्वाभिमान से चंदर तिलमिला उठा| “मनुष्य का एक स्वभाव होता है। जब वह दूसरे पर दया करता है तो वह चाहता है कि याचक पूरी तरह विनम्र होकर उसे स्वीकार करे। अगर याचक दान लेने में कहीं भी स्वाभिमान दिखाता है तो आदमी अपनी दानवृत्ति और दयाभाव भूलकर नृशंसता से उसके स्वाभिमान को कुचलने में व्यस्त हो जाता है।”

बर्टी, चंदर से कहता है; “वही आदमी असाधारण होता है जो किसी परिस्तिथि में किसी भी तथ्य को स्वीकार नहीं करता, उनका निषेध करता चलता है| जब वह किसी को भी स्वीकार कर लेता है तब वह पराजित हो जाता है|"

बिनती से चंदर की सुलह हो गई..चंदर को लगता है मानो पम्मी की वासना ने उसके मन की कटुता, सारा विष खिंच लिया हो|

बिनती  डॉ. शुक्ला के साथ दिल्ली चली जाती है|  
चंदर अपने अतीत तो भुलाकर पम्मी की नशीली निगाहों में खो गया था|

अप्रैल की एक शाम| गेसू, सुधा के घर आती है और चंदर से मुलाकात होती है| गेसू से पता चलता है की अख्तर मियां की शादी उसकी बजाय, छोटी बहन फूल से हो गयी है|
चंदर को दुख हुआ यह जानकार| परन्तु गेसू से अख्तर के प्रेम में विश्वास पर आश्चर्य हुआ|  गेसू बड़े विश्वास से कहती है,वो उसे मिलकर रहेंगे जाहे कयामत के बाद सही|    
गेसू की प्रेम और विश्वास के रूप पर चंदर का मन काँप उठा, अपने प्यार से सच्चाई के बारे में सोच कर| गेसू ने आज उसके सामने वह तस्वीर रख दी थी जिसमे वह स्वर्ग की उचाईयों पर मंडराया करता था| गेसू ने अनजाने में ही चंदर के अविश्वास, प्रतिहिंशा को बहुत बड़ी हार दी थी|उसको अन्दर तक झझकोर दिया

इधर कई दिनों तक पम्मी के घर नहीं गया तो पम्मी खुद उससे मिलाने आ गयी| चंदर कुछ अनमना सा था|
अगर आप किसी औरत के हाथ पर हाथ रखते हैं तो स्पर्श की अनुभूति से ही वह जान जाएगी कि आप उससे कोई प्रश्न कर रहे हैं, याचना कर रहे हैं, सांत्वना दे रहे हैं या सांत्वना मांग रहे हैं। क्षमा मांग रहे हैं या क्षमा दे रहे हैं, प्यार का आरंभ कर रहे हैं या समाप्त कर रहे हैं? स्वागत कर रहे हैं या विदा दे रहे हैं? यह पुलक का स्पर्श है या उदासी का चाव और नशे का स्पर्श है या खिन्नता और बेमनी का?
पम्मी का जादू टूट रहा था..चंदर की इस उपेक्षा से वह उदास थी..फिर एक दिन हमेशा के लिए लखनऊ चली गयी|
चंदर के अंतर्द्वंद के छनों में उसकी अंतरात्मा उससे कहती है.."तू कहता है तुने स्वार्थ नहीं किया| विकलांग देवता! वही स्वार्थी है जो अपने आप से ऊपर नहीं उठ पाता| तेरे लिए अपनी एक सांस भी दुसरे के तूफान से ज्यादा महत्वपूर्ण रही है| तुने अपने मन की उपेक्षा के पीछे सुधा को भट्टी में झोंक दिया| पम्मी के अस्वथ्य मन को पहचान कर भी उसके रूप का उपभोग करने में नहीं हिचका| बिनती को प्यार न करते हुए भी तुमने उसे स्वीकार किया, फिर सबों का तिरस्कार करता गया.."

"मैं नहीं कहता की तुम ईमानदार नहीं हो, तुम शक्तिशाली नहीं हो, लेकिन तुम अंतर्मुखी रहे, घोर व्यक्तिवादी रहे, अहंकारग्रस्त रहे| मन की विकृतियों को भी ताकत समझने की कोशिश की|कोई भी जीवन-दर्शन बिना ब्राह्य-यथार्थ और व्यापक-सत्य के बिना अधुरा है| तुमने सुधा के साथ उंचाई निभाई, लेकिन अगर तेरे व्यक्तित्व को, तेरे मन को, जरा-से ठेस पहुंचती है तो तू गुमराह तो गया होता|तुने सुधा के स्नेह का निषेध कर दिया | तुने बिनती की श्रध्हा का तिरस्कार किया| तुमने पम्मी की पवित्रतिता भ्रष्ट की..और इस अपनी साधना समझता है|'

"तुम्हारी आत्मा में एक शक्ति थी, एक तूफान था|लेकिन यह लक्ष्य भ्रष्ट था| तुम्हारी  जिंदगी में लहरें उठने लगीं लेकिन गहराई नहीं|
सत्य उसे मिलता है जिसकी आत्मा शांत और गहरी होती है समुद्र की गहराई की तरह| समुद्र की ऊपरी सतह की तरह जो विक्षुब्द और तूफ़ानी होता है, उसके अंतर्द्वंद में चाहे कितनी गरज हो लेकिन सत्य की शांत अमृतमयी आवाज़ नहीं होती|"

"तुममे शक्ति रही पर धैर्य और दृढ़ता बिलकुल नहीं| तुम गंभीर समुद्रतल न बनकर एक सशक्त लेकिन अशांत लहर बन गये हो जो हर किनारे से टकराकर उसे तोड़ने के लिए व्यग्र हो उठी|तुममे ठहराव नहीं था| साधना नहीं थी! तुम्हे जहाँ से भी जरा भी तकलीफ़ मिली, अवरोध मिला वहीँ से तुमने अपना हाथ खींच लिया! वही तुम भाग खड़े हुए| तुमने हमेशा उसका निषेध किया- पहले तुमने समाज का किया, व्यक्ति को साधना का केंद्र बनाया; फिर व्यक्ति का भी निषेध किया|  "

इस बार सुधा आयी,बहुत बीमार थी, बहुत| सुधा ने अपने आप को "प्रायश्चित" के लिए मिटा डाला था| उस इस बात से बहुत कुंठा हुई कि उसके प्यार में कौन सी दुर्बलता रही कि चंदर, उसके मन की पूजा को ग्रहण नहीं कर पाया|



कौन है "गुनाहों का देवता" और क्यों?
चंदर ने प्यार की उचाईयों को छुआ, अपने पवित्रता और महानता के लिए सुधा के प्यार का बलिदान ले लिया| चंदर को अपने प्यार पर अहंकार था| मन की विकृतियों को ताकत समझा| अपने व्यक्तित्व में शक्ति तो पाई पर गहराई नहीं, जो जरा सी ठेस पर गुमराह हो गया|चंदर ने प्रेम का निषेध किया|यथार्थ और भावना का संतुलन नहीं रखा|    
यह जानते हुए भी की सुधा उसकी आत्मा है, जिसके बिना वह एक शरीर मात्र है,  और उसके बिना सुधा मात्र एक शरीर-विहीन सूक्ष्म-आत्मा| उसने स्वम ही अपने आत्मा का गला घोंट डाला था| सुधा के दुख को स्वांग समझकर, अपने आप को प्रतिहिंसा में वासना में डुबो दिया था और सुधा के प्यार को हमेशा के दफ़ना दिया था|
एक और जहाँ सुधा ने चंदर के प्यार और विश्वास के लिए अपनी अंतरात्मा के विरुद्ध जाकर भी विवाह को स्वीकार किया ताकि उसके देवता  की  साधना में विध्न ना हो| वहीँ चंदर ने सुधा के प्यार के पुष्प को नकली और बासी समझकर, अपने भक्त की श्रद्धा और समर्पण का पूर्ण तिरस्कार किया और अपने इन्ही अंतर्द्वंदों की वजह से तथाकथित देवत्व से भी स्खलित हो गया| जिसे वापस दिलाने के "भक्त" सुधा ने प्रायश्चित के तौर पर अपने आप को मिटा  डाला|


कुछ प्रश्न?
क्या समाज की दृष्टि में एक व्यक्ति की महानता और असाधारणता, उसके प्यार और अंतरात्मा से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है?   
क्या चंदर और सुधा का अपने प्यार का बलिदान ही सही और अंतिम रास्ता था?
क्या प्लेटोनिक प्रेम की परणीती प्रणय और विवाह में ही होना उचित है?


मेरे विचार:
जिंदगी के कुछ पात्रों  को लेकर, उनके साथ चलकर एक उपन्यास लिखना बहुत ही मेहनत और जोखिम का काम है| क्योंकि आपको मालूम नहीं वे सब अपनी जिंदगी के परणीती   तक किन-किन रास्तों  से होकर पहुचेगें| हालाकिं हो सकता है आपने अंत सोच लिया हो पर एक प्रकार से आपको उन पात्रो की जिंदगी, उनकी ख़ुशियाँ, उनके गम, सभी स्वयं जीना पड़ेगा| ये काफी पीड़ादायक भी हो सकती है और सुखकारक भी| मैंने धर्मवीर भारती जी का उपन्यास "गुनाहों का देवता" पढ़ा| कई बार पढ़ा| हर बार कुछ नया-नया सा लगा| इसके पात्र "चंदर" और "सुधा" ने मुझे इतना प्रभावित किया कि लगा काश अगर वे सचमुच के होते तो में उनसे एक बार ज़रूर मिलता|

हालंकि ये उपन्यास 1959 में लिखी गयी थी पर जो मुद्दे इसमें उठाये गए है वे आज भी प्रासंगिक है जैसे प्रेम का आदर्श स्वरूप, प्रेम-विवाह, अन्तर्जातीय-विवाह, प्रेम और वासना, बलिदान या समर्पण, महानता या साधारणता इत्यादि| पर तर्क और बुद्धि से परे सोचनेवाले पाठकों के लिए यह उपन्यास आज भी उतनी ही प्रिय है|

मैंने जो भी यहाँ लिखा है उसे इस पुस्तक के बारे में पर्याप्त नहीं कहा जा सकता और इसका निरपेक्ष मूल्याकन भी शायद मेरे लिए संभव नहीं है| इसके लिए आपको ये पुस्तक स्वयं पढनी चाहिए|  हालांकि इस किताब को शुरू करने से पहले यह सुनिश्चित करें कि आपके पास पर्याप्त समय है इसे पढने के लिए, क्योंकि यह आपको पूरा समाप्त करने के लिए बाध्य कर सकता बिना ब्रेक के|

 

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